क्या कॉरपोरेट घरानों की विरासत बन चुकी हैं, मिडिया संस्थान

✍️अनुपम कुमार दुबे की कलम से……………
विगत कुछ दिनो की घटनाओं को देख मेरे मन मे एक विचार उत्पन्न हुआ आप से शेयर कर रहा हु।
क्या कॉरपोरेट घरानों द्वारा चलाए जा रहे या पारिवारिक विरासत बन चुके मीडिया संस्थानों के बीच किसी ऐसे संस्थान की कल्पना की जा सकती है जहां सिर्फ पत्रकार और पाठक को महत्व दिया जाए? जहां सच मे लोकतन्त्र की बात हो जो समाज हित मे कोई ऐसा अखबार, टेलीविजन चैनल या मीडिया वेबसाइट जहां संपादक पत्रकारों की नियुक्ति, खबरों की कवरेज जैसे फैसले संस्थान और पत्रकारिता के हित को ध्यान में रखकर ले, न कि संस्थान मालिक या किसी नेता या विज्ञापनदाता को ध्यान में रखकर आज जो घटना देखी उससे तो नहीं लगता । किसी भी लोकतंत्र में जनता मीडिया से इतनी उम्मीद तो करती है उस पर क्या पत्रकारिता खरा उतर रहा है हमे तो नही लगता जरा सोचिये भारत जैसे विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र में मीडिया के वर्तमान माहौल में संपादकों को ये आजादी बमुश्किल मिलती है । कही संपादक तो कही पत्रकार ओछी राजनीति के कारण प्रताड़ित किये जाते रहें है,वक्त के साथ-साथ पत्रकारिता का स्तर नीचे जा रहा है, स्थितियां और खराब होती जा रही हैं।
अब कुछ दिनो से सोसलमिडिया या पत्रकारिता द्वारा जो खबर सामने आ रही है वो तो और भी निन्दनीय है,यहा तो कॉरपोरेटर ही संपादक हैं और राजनीति से भी जुड़े हैं। जो अपनी मनमानी करते है,उनके मन मुताबिक खबर छपनी चाहिए नहीं तो पत्रकारों का शोषण होता हैं उन्हें प्रताडित आये दिन किया जाता हैं,जिसके खिलाफ पत्रकारसंघ भी नहीं खड़ा होता।
अब पत्रकारिता व संपादकीय इतने निचले स्तर पर आ गया है,कि जिसके खिलाफ समाजिक संस्थानो को आगें आना पड़ रहा है,अगर ऐसा ही चलता रहा तो लोगों का पत्रकारिता से विश्वास उठ जायेगा और धिरे धिरे जो सत्य तख्तों को रखते हैं ऐसे लोकतंत्र के सच्चे स्तंभों का भी कोई मान सम्मान नहीं रहेगा।

आपका:-
अनुपम कुमार दुबे
📱7666694255

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